भोजपुरी लोक-संस्कृति, कजरी एवं पारंपरिक गीतों का जीवंत संग्रह
“संस्कृति, माटी की सोंधी महक और लोक परंपरा का अनूठा दस्तावेज – ‘मड़ये की हरदी'”
भोजपुरी समाज और उसकी मिठास का आधार उसकी समृद्ध लोक भाषा, देशज शब्द और पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराएँ हैं। पूर्वांचल की पावन माटी और मिर्ज़ापुर के सुप्रसिद्ध कजरी गीतों की फिज़ा से उपजी कृति ‘मड़ये की हरदी’ भोजपुरी साहित्य जगत में एक अनमोल धरोहर है। ‘लोकभाषा रस सिंधु’ श्रेणी की इस पुस्तक का संपादन किया है स्याही प्रकाशन के प्रधान संपादक व ख्यात प्रकाशक पण्डित छतिश दिवेदी ‘‘कुण्ठित’’ ने।
पेशे से इंजीनियर और हृदय से अत्यंत संवेदनशील कवि रामनरेश ‘नरेश’ जी द्वारा रचित यह काव्य संग्रह लोक विधा के विभिन्न सोपानों—जैसे कजरी, झूमर, सोहर, विरह गीत, पूजायन और देशप्रेम की रचनाओं—को एक नए आवरण और मधुर स्वर में प्रस्तुत करता है।
इस पुस्तक की मुख्य विशेषताएँ (Key Highlights):
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लोक संस्कृति और संस्कारों का समावेश: मनुष्य के जन्म से लेकर विवाह, विदाई, तीज-त्योहार और ऋतुओं (सावन, जाड़ा, गर्मी) पर आधारित पारंपरिक गीतों का सुंदर ताना-बाना।
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मिर्ज़ापुर की विश्व प्रसिद्ध कजरी: चुनार की पहाड़ियों और ग्रामीण परिवेश की उपज ‘कजरी’ एवं ‘झूमर’ के माध्यम से विरह और प्रेम का मार्मिक वर्णन।
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शुद्ध देशज शब्दावली: भोजपुरी के खांटी देशज शब्दों, लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग, जो भाषा की मिठास और मौलिकता को जीवंत रखता है।
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गेय शैली (Musical & Poetic): लोक संस्कृति की मूल आत्मा को समेटे हुए सभी रचनाएँ गाने योग्य (गेय) शैली में रचित हैं।
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विरासत को सहेजने का प्रयास: आधुनिकता के दौर में विलुप्त होती स्थानीय बोलियों और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने का एक पुण्य enterprise/प्रयास।
‘मड़ये की हरदी’ केवल एक काव्य संग्रह नहीं, बल्कि यह भोजपुरी समाज की उत्सवधर्मिता, आँचलिकता और सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यदि आप भोजपुरी साहित्य, लोक संगीत और अपनी माटी की खुशबू से प्यार करते हैं, तो यह पुस्तक आपके पुस्तकालय में अवश्य होनी चाहिए।







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