सृजन से अमरता की ओर…

सृजन व साहित्य साधना के पथ पर मनुष्य जीवन के अनश्वर होने की सुखद यात्रा…

मानव जीवन केवल जन्म, भोग और मृत्यु की कहानी नहीं रहा है। यदि ऐसा होता, तो संसार में असंख्य सभ्यताएँ, साहित्य, कला, विज्ञान और संस्कृति कभी जन्म ही न लेते। मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि और उसकी पहचान उसके सृजन में निहित है। वह मिट्टी से प्रतिमा बनाता है, शब्दों से कविता रचता है, रंगों से विचारों की आकृति भरता है, विचारों से समाज गढ़ता है और प्रेम से मानवता की सुन्दर तस्वीर पूरा करता है। यही सृजन उसे अन्य सामान्य दूसरे जीवों से उसे अलग बनाता है। सृजन की यह यात्रा केवल रचना तक सीमित नहीं रहती; वह श्रृंगार का रूप धारण करती है, श्रृंगार से प्रेम जन्म लेता है और प्रेम अंततः भक्ति के शीर्ष पर पहुँचकर अमरता का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्याही प्रकाशन का “सृजन से अमरता की ओर” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि रचनाकार के लिए जीवन-दर्शन है। यह मनुष्य की उस सतत यात्रा का घोष है जो उसे क्षणभंगुरता से उठाकर शाश्वतता की ओर ले जाती है। इस यात्रा में साहित्य, कला, संस्कृति, संवेदना और प्रेम सभी सहयात्री बन जाते हैं। स्याही प्रकाशन का यह ध्येय-वाक्य इसी मानवीय चेतना का प्रतिनिधित्व करता रहा है।
सोचनीय है कि जब आदिमानव ने पहली बार किसी गुफा की दीवार पर चित्र उकेरा होगा, तब शायद उसे यह ज्ञात नहीं था कि वह इतिहास का पहला कलाकार बन रहा है। जब किसी ऋषि ने प्रथम मंत्र की रचना की होगी, तब उसने भी नहीं सोचा होगा कि उसके शब्द हजारों वर्षों तक गूँजते रहेंगे और लोकमंगल के वायुमण्डल में अनश्वर हो जाएंगे। यही सृजन की शक्ति है।
सृजन केवल लिखना या चित्र बनाना नहीं है। एक किसान जब खेत में बीज डालता है, वह भी सृजन है। एक शिक्षक जब ज्ञान का दीप जलाता है, वह भी सृजन ही है। एक माँ जब अपने बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण करती है, वह भी सृजन है। सृजन का अर्थ है-किसी नई संभावना को जन्म देना।
मनुष्य की समस्त उपलब्धियों का मूल सृजन ही तो रहा है। वेदों की ऋचाएँ, रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य, तमाम स्थापत्य कलायें, संगीत की मधुर धुनें, विज्ञान के अद्भुत आविष्कार: ये सभी सृजन की अमूल्य देन हैं। साथ ही सृजन मनुष्य की आत्मा का विस्तार है। वह अपनी सीमित देह से आगे निकलकर अपनी स्निग्ध कल्पनाओं, अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों के माध्यम से व्यापक संसार में प्रवेश करता है।
सृजन का अगला पड़ाव है-श्रृंगार। यहाँ श्रृंगार का अर्थ केवल बाह्य सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन को सुंदर, मधुर और अर्थपूर्ण बनाना है। जब कोई कवि कविता रचता है, तो वह शब्दों का श्रृंगार करता है। जब कोई चित्रकार रंगों को संयोजित करता है, तो वह सौंदर्ययुक्त कल्पना का श्रृंगार रचता है। जब कोई लेखक अपने विचारों को संवेदनशील भाषा देता है, तब वह भावों का श्रृंगार करता है।
भारतीय संस्कृति व भाषा विज्ञान में श्रृंगार को रसों का राजा कहा गया है। इसका कारण यह है कि श्रृंगार केवल आकर्षण नहीं, बल्कि संवेदनाओं का परिष्कृत रूप है। यह मनुष्य को कठोरता से कोमलता की ओर, रूक्षता से मधुरता की ओर और असंवेदनशीलता से करुणा की ओर ले जाता है। साहित्य में श्रृंगार का अर्थ है-शब्दों को सौंदर्य प्रदान करना। जीवन में श्रृंगार का अर्थ है-विचारों को सकारात्मकता और प्राचीनता की भूमि पर नवीनता देना। समाज में श्रृंगार का अर्थ है-संबंधों में मधुरता घोलना। यदि सृजन बीज है, तो श्रृंगार उसका पुष्प है। बीज के भीतर संभावना होती है, जबकि पुष्प उस संभावना का सौंदर्यमय पूर्ण विस्तार होता है।
जब सौंदर्य हृदय को स्पर्श करता है, तब प्रेम जन्म लेता है। प्रेम मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। यह वह भावना है जो व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठाकर दूसरों की आत्मा से जोड़ती है। प्रेम केवल स्त्री-पुरुष के संबंध तक सीमित नहीं है, इसे इतना ही समझना बेहद गलत है। प्रेम माता का अपने पुत्र के प्रति वात्सल्य है, गुरु का शिष्य के प्रति स्नेह है, राष्ट्रभक्त का देश के प्रति समर्पण है और कवि या लेखक का अपनी रचना के प्रति अनुराग है, यह चित्रकार का अपने कैनवास पर उकेरी गयी रेखाओं से गहरा मोह है। हाँ, सच्चा प्रेम स्वार्थरहित होता है। उसमें पाने की नहीं, देने की भावना होती है। यही कारण है कि प्रेम मनुष्य को महान बनाता है। प्रेम के बिना हर सृजन अधूरा है और हर श्रृंगार निष्प्राण। और हाँ एक बात और कि श्रृंगार बिन हर आकृति एवं शब्दवृत्ति नाशवान है।
कबीरदास जी ने प्रेम को जीवन का सार बताते हए कहा है कि –
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
यहाँ प्रेम को ज्ञान से भी ऊँचा स्थान प्राप्त है। क्योंकि प्रेम ही वह तत्व है जो ज्ञान को सहज और मनुष्य को मनुष्य बनाता है। प्रेम के बिना साहित्य कोई भी हो केवल शब्दों का समूह रह जाता है। प्रेम के बिना कला केवल बोझिल तकनीक बनकर रह जाती है। प्रेम के बिना समाज केवल शरीरों का भीड़ बन जाता है। प्रेम ही वह सूत्र है जो समस्त सृष्टि को स्पंदित करता है।
हर महान रचना के मूल में प्रेम ही होता है। तुलसीदास ने राम के प्रति प्रेम से रामचरितमानस की रचना की। रचना प्रेम से उपजी भक्ति से कृपा प्राप्त कर अमर हो गई। सूरदास ने कृष्ण के प्रति प्रेम से अमर पदों का सृजन किया। मीरा का समर्पण प्रेम की चरम भक्ति की अभिव्यक्ति ही तो थी। जब लेखक अपनी रचना से प्रेम करता है, तब उसके शब्दों में जीवंतता आ जाती है। जब कलाकार अपनी कला से प्रेम करता है, तब उसकी कृति प्रेमपूर्ण होकर कालजयी बन जाती है। प्रेम सृजन को आत्मा प्रदान करता है। बिना प्रेम के सृजन केवल कृत्रिम यांत्रिक प्रक्रिया है, लेकिन प्रेम जुड़ते ही वह कल्पना-चेतना का उत्सव रंग बन जाता है।
यह सत्य है कि हर मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है, लेकिन सभी अमर नहीं होते। अमरता शरीर की नहीं, प्रेमशील सृजन की होती है। अमरता हर तरह के कर्म और प्रयास को नहीं मिलती। आज हम महर्षि वाल्मीकि को याद करते हैं, क्योंकि उन्होंने रामायण की रचना की। हम कालिदास को याद करते हैं क्योंकि उनकी कृतियाँ आज भी जीवित हैं। हम प्रेमचंद, निराला, दिनकर और महादेवी वर्मा को इसलिए स्मरण करते हैं क्योंकि उनका साहित्य समय की सीमाओं को लाँघ चुका है।
अमरता का अर्थ है-पीढ़ियों तक स्मरण किया जाना है। यह धन से नहीं मिलती, पद से नहीं मिल सकती, बल्कि सृजन और गहरे प्रेम से सहज ही प्राप्त हो सकती है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य और जानना है कि एक पुस्तक लेखक के जीवनकाल से कहीं अधिक समय तक जीवित रह सकती है। एक विचार शताब्दियों तक समाज का मार्गदर्शन कर सकता है। एक सुन्दर कविता अनगिनत हृदयों को प्रेरित कर सकती है। और पीढ़ियाँ उसे सहेजती जाती हैं। यही तो अमरता है।
मानव इतिहास में साहित्य ने रचनाकार को सहज अमरता प्रदान करने का सबसे बड़ा कार्य किया है। राजाओं के महल नष्ट हो गए, साम्राज्य मिट गए, लेकिन साहित्य और उसको रचने वाला सदा जीवित रहता है। भाव को गर्भ में बैठाए शब्दों की शक्ति समय को पराजित कर देती है। एक लेखक अपनी लेखनी के माध्यम से भविष्य की पीढ़ियों से संवाद करता रहता है। वह अपने युग की चेतना को आने वाले समय तक पहुँचाकर युगों को परस्पर जोड़ देता है।
पुस्तकें केवल कागज़ और स्याही की आपसी रेखाकारी या उसका संग्रह नहीं होतीं। वे कल्पनाओं, अनुभवों, विचारों, संघर्षों और सपनों की धरोहर होती हैं। इसलिए, जो व्यक्ति लिखता है, वह केवल वर्तमान के लिए नहीं लिखता; वह भविष्य के लिए भी लिखता है।
स्याही का महत्व केवल अक्षर लेखन तक सीमित नहीं है। यह मानव सभ्यता की स्मृति निर्माता एवं बोध निर्वाहक है। स्याही ने इतिहास को सुरक्षित रखा है, ज्ञान के हर पहलू को संरक्षित किया और संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे लेकर चल रही है।
एक लेखक के मन में जन्मा विचार तब तक सीमित रहता है जब तक वह शब्दों में व्यक्त न हो जाए। स्याही सादे कागज के आकाश में उन विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है। यही कारण है कि स्याही केवल रंग नहीं, बल्कि हर कल्पना, चेतना, या कहें प्रेम का वाहक है।
जब कोई लेखक अपनी पुस्तक प्रकाशित कराता है, तो वह अपने अनुभवों और विचारों को समय की धारा में प्रवाहित कर देता है। तब उसकी रचना अनेक लोगों के मर्म व जीवन को स्पर्श करती है और वह लेखक और रकी कृति स्वयं अमरता की ओर अग्रसर हो जाते हैं।
रचनाकार सृजन करता है, लेकिन उसकी रचना दर्शकों-पाठकों तक पहुँचाने का कार्य प्रकाशन करता है। प्रकाशक केवल पुस्तक नहीं छापता; वह तथ्यात्मक या काल्पनिक विचारों को समाज की हर जिग्यासा तक पहुँचाता है। एक अच्छा प्रकाशन संस्थान सृजन को सम्मान देता है, प्रतिभाओं को मंच देता है और मांगलिक साहित्यिक संस्कृति को समृद्ध बनाता है। वह रचनाकार और पाठक-दर्शक के बीच एक अटूट सेतु बन जाता है। जब कोई नई पुस्तक प्रकाशित होती है, तब केवल एक रचना नहीं जन्म लेती; एक नया विचार मार्ग और अन्वेषण समाज में प्रवेश करता है। यही कारण है कि प्रकाशन कार्य को सांस्कृतिक साधना कहा जा सकता है।
हमारा ‘‘कदम-कदम, अनवरत’’ वाक्य जीवन के सतत प्रवाह का प्रतीक बन रहा है। ठीक वैसे, जैसे, सृजन की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। प्रत्येक रचना एक नए सृजन की प्रेरणा बनती है। फिर, नई रचना बनकर जन्म लेती है, यहाँ लेखक लिखता है, पाठक पढ़ता है, प्रेरित होता है और फिर स्वयं कुछ नया रचता है। इस प्रकार सृजन की यह श्रृंखला निरंतर चलती रहती है।
जीवन में सफलता का अर्थ केवल उपलब्धियाँ प्राप्त करना नहीं है। वास्तविक सफलता यह है कि हम अपने पीछे ऐसा कुछ छोड़ जाएँ जो आने वाली पीढ़ियों के काम आए। यही सृजन की सार्थकता है और यही अमरता का मार्ग है।
हम मानते रहे हैं कि हर सृजन मनुष्य की आत्मा का प्रबल उद्घोष है। सृजन से सौंदर्य उत्पन्न होता है, सौंदर्य से प्रेम और प्रेम से भक्ति, और भक्ति से अमरता। यही जीवन की सबसे सुंदर यात्रा है। जो व्यक्ति सृजन करता है, वह धीरे-धीरे समय की विनाशकारी सीमाओं से परे चला जाता है। उसकी रचनाएँ, उसके विचार और उसकी संवेदनाएँ आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहती हैं।
“सृजन से श्रृंगार, श्रृंगार से प्रेम एवं प्रेम से अमरता तक साथ” स्याही प्रकाशन का केवल एक ध्येय-वाक्य नहीं, बल्कि मानव जीवन का अन्तिम औश्र गहन दर्शन है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन की वास्तविक उपलब्धि धन, पद या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि ऐसा सृजन है जो मानवता के हृदय में स्थान बना सके। मोहक एवं चिर मांगलिक हो।
तो, प्रिय आइए, हम भी इस पावन सृजन यात्रा के सहयात्री बनें। कल्पनाओं से, विचारों से, कर्मों से, रचना से, शब्दों से और प्रेम से अपने जीवन को सार्थक बनाएँ। समय से परे शरीर तो नहीं जा सकता, लेकिन, इसमें धुधकियों के स्पंदन से महसूस होती आत्मा की कृति समय की प्राचीर लाँघ सकती है। क्योंकि, सृजन ही वह दीप है जो मृत्यु के अंधकार के पार भी प्रकाश देता रहा है, और वही हमें अमरता की ओर ले जा सकता है। यह सच है कि बहुतेरे गये हैं, बहुतेरे अभी जायेंगे भी।
बस, करना क्या है?-सृजन। शर्त एक ही है कि-प्रेमपूर्ण।
आइए, यात्रा शुरू करें… सृजन से अमरता की ओर।

पं0 छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’
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