‘जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ’ वाराणसी के वकील और बेहतरीन कवि प्रसन्न बदन चतुर्वेदी ‘अनघ’ की लिखी ग़ज़लों का एक शानदार संग्रह है, जिसे वाराणसी के ‘स्याही प्रकाशन’ ने छापा है। इसे वाराणसी के साहित्य, पत्रकारिता और संपादन की दुनिया के जाने-माने नाम पण्ठित छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ ने संपादित किया है। ग़ज़ल अरबी साहित्य की एक मशहूर काव्य-विधा है, जो बाद में उर्दू, नेपाली, फ़ारसी और हिंदी साहित्य में भी बहुत लोकप्रिय हो गई। ग़ज़ल एक ही वज़न और लय में लिखे गए शेरों का समूह होती है। ग़ज़ल के पहले शेर को ‘मतला’ कहा जाता है। ग़ज़ल के आखिरी शेर को ‘मक़्ता’ कहते हैं। आमतौर पर कवि मक़्ते में अपना नाम लिखता है।
कवि ने इस ग़ज़ल संग्रह में बेहतरीन रचनाओं को जगह दी है और ग़ज़ल के उन पैमानों का पालन किया है जो ग़ज़ल को असल ग़ज़ल बनाते हैं। इस संग्रह में सिर्फ़ हिंदी ग़ज़ल के व्याकरण और विधा के सिद्धांतों और आदर्शों के अनुसार लिखी गई ग़ज़लें शामिल हैं। ‘स्याही प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रहों में ‘जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ’ एक अहम संग्रह के तौर पर चर्चा में है। कवि ने किसी कारीगर की तरह हर शब्द, हर भावना, हर मिसरे और हर शेर को ग़ज़ल के नियमों, सिद्धांतों और व्याकरण के सांचे में ढालकर तराशा है। ग़ज़ल प्रेमियों के लिए यह संग्रह ज़रूर पढ़ने लायक है। इसमें खुशी भी है, गम भी, हास्य की झलक भी है और आंसुओं का बहाव भी; प्यार भी है और जुदाई भी; अगर अधूरापन है तो लगाव भी; जहाँ स्त्री की बात है, वहाँ पुरुषों के अधिकारों की रक्षा भी है। इसमें पति-पत्नी के सुख का भी ज़िक्र है और इतना ही नहीं, जिसके लिए ग़ज़ल जानी जाती है, यानी खूबसूरती का वर्णन भी है।
इसमें सूफी ग़ज़ल के दौर की तड़प का भी बेहतरीन समावेश है। कुल मिलाकर, यह ग़ज़ल संग्रह न सिर्फ़ पढ़ने लायक है, बल्कि पाठकों के लिए सहेजकर रखने लायक भी है।








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