‘दू भाव ना होई’ समकालीन भोजपुरी नाट्य साहित्य की एक सशक्त और विचारोत्तेजक कृति है, जो ग्रामीण समाज के भीतर व्याप्त स्त्री–पुरुष भेदभाव, विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति, सत्ता के दोहरे चरित्र और नैतिक पतन को निर्भीकता से उजागर करती है। यह नाटक केवल मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाठक के भीतर संवेदना, प्रश्न और प्रतिरोध की चेतना को जाग्रत करता है। यह कृति उस सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है, जहाँ पुरुष के लिए अनेक सामाजिक छूटें सहज स्वीकार्य हैं, जबकि स्त्री—विशेषकर विधवा—के लिए जीवन स्वयं एक दंड बन जाता है। विधवा विवाह जैसे विषय पर समाज का दोगलापन, नैतिकता के नाम पर स्त्री पर थोपी गई मर्यादाएँ और पुरुष के अपराधों पर ओढ़ी गई चुप्पी—इन सबको यह नाटक बिना लाग-लपेट के मंच पर रखता है। नाटक के पात्र—किरन, हुलासो, त्रिशंकु और चमेली बाई—केवल चरित्र नहीं, बल्कि समाज के जीवंत प्रतीक हैं। किरन की चुप्पी, उसकी विवशता और अंततः उसका प्रतिरोध उस स्त्री की आवाज़ है, जिसे सदियों से दबाया गया। चमेली बाई का निर्भीक प्रवेश और उसका मुखर विरोध नाटक को निर्णायक ऊँचाई पर ले जाता है, जहाँ ‘दू भाव’ यानी दोहरे चरित्र की कोई गुंजाइश नहीं बचती। इस नाट्य-कृति की सबसे बड़ी शक्ति इसकी भोजपुरी लोकभाषा है, जो संवादों को अत्यंत सहज, विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाती है। संवाद केवल कथोपकथन नहीं, बल्कि सामाजिक सच्चाइयों के उद्घोष हैं। मंचीय निर्देश, दृश्य-संरचना और घटनाक्रम इसे रंगमंच के साथ-साथ पाठ्य-नाटक के रूप में भी अत्यंत पठनीय बनाते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार एवं संवेदनशील नाटककार डा. अनिल सिन्हा ‘बहुमुखी’ ने इस कृति के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि समाज तब तक स्वस्थ नहीं हो सकता, जब तक स्त्री और पुरुष के लिए नैतिकता के मापदंड अलग-अलग रहेंगे। स्याही प्रकाशन के प्रकाशक और प्रधान सम्पादक एवं ख्यात साहित्यकार पण्डित छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ के अनुसार यह नाटक मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप है—एक ऐसा हस्तक्षेप जो पाठक और दर्शक दोनों से सवाल करता है और उत्तर खोजने के लिए विवश करता है। ‘दू भाव ना होई’ उन पाठकों, रंगकर्मियों, शोधार्थियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, जो हिन्दी नाट्य साहित्य में यथार्थ, साहस और वैचारिक दृढ़ता की तलाश में हैं। यह कृति निश्चय ही हिन्दी रंगमंच और सामाजिक विमर्श को नई दिशा देने वाली एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक सिद्ध होगी। ::::::::: विषय: सामाजिक नाटक, स्त्री विमर्श, ग्रामीण यथार्थ ::::::::: भाषा: सरल, सशक्त लोकभाषा भोजपुरी
दू भाव ना होई
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+ Free Shipping‘दू भाव ना होई’ समकालीन भोजपुरी नाट्य साहित्य की एक सशक्त और विचारोत्तेजक कृति है, जो ग्रामीण समाज के भीतर व्याप्त स्त्री–पुरुष भेदभाव, विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति, सत्ता के दोहरे चरित्र और नैतिक पतन को निर्भीकता से उजागर करती है। यह नाटक केवल मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाठक के भीतर संवेदना, प्रश्न और प्रतिरोध की चेतना को जाग्रत करता है। यह कृति उस सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है, जहाँ पुरुष के लिए अनेक सामाजिक छूटें सहज स्वीकार्य हैं, जबकि स्त्री—विशेषकर विधवा—के लिए जीवन स्वयं एक दंड बन जाता है। विधवा विवाह जैसे विषय पर समाज का दोगलापन, नैतिकता के नाम पर स्त्री पर थोपी गई मर्यादाएँ और पुरुष के अपराधों पर ओढ़ी गई चुप्पी—इन सबको यह नाटक बिना लाग-लपेट के मंच पर रखता है।







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