धर्म और कर्मकांड
नरेन्द्र बहादुर सिंह द्वारा लिखित व ‘स्याही प्रकाशन’ वाराणसी से प्रकाशित यह किताब ‘धर्म और कर्मकाण्ड’ अपने शीर्षक से ही अपनी विषय वस्तु प्रकट कर रही है। पूरे विश्व में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी धर्म का अनुयायी है। जो सारे धर्मों को नहीं मानता वह नास्तिक वर्ग मे आकर एक खास तरह की मान्यता से बँध जाता है। एक धर्म के अनुयायी द्वारा दूसरे धर्म को कई सारी कुंठाओं और खराबियों के धारक के रुप में देखा व बताया जाता है। ऐसे में मनुष्य के निधारित धर्म की अच्छाइयों और बुराइयों पर समग्र दृष्टि डालते हुए एक समीक्षात्मक पुस्तक लिखने का जो महान तथा साहसिक कार्य किया है, उसके लिए नरेन्द्र बहादुर सिंह जी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। साथ ही नरेन्द्र बहादुर सिंह जो पीसीएस सेवा से अपने सेवानिवृत्ति काल से लगभग सात वर्ष पूर्व ही त्यागपत्र दे देने की हिम्मत करने वाले बिरले त्याग पुरुष हैं।
कारण सिर्फ यही है कि समाज में व्याप्त भ्रान्तियों को दूर किया जाये। यह किताब पढ़ने के बाद कोई व्यक्ति धर्म की समूल जानकारी से वंचित नहीं रह सकता। यह किताब सभी धर्मालम्बियों के लिए मनन सामग्री है। खासकर उनके लिये जो मानव के उचित धर्म को जानना-समझना चाहते हों, उन्हें अवश्य पढ़नी चाहिए। इसे पढ़ने के बाद मानव रचित धर्म में व्याप्त व्यर्थ के कर्मकाण्ड व उनसे जुड़ी अनेक भ्रांतियाँ और कई तरह की अतिरिक्त बातें साफ-साफ पता चल जाती हैं। इतना ही नहीं नरेन्द्र जी के खरे तर्कों की कसौटी पर कर्मकाण्डों की सार्थकता और निरर्थकता का ज्ञान हो जाता है। इस पुस्तक ‘धर्म और कर्मकाण्ड’ के दूसरे संस्करण का सम्पादन काशी के वरिष्ठ साहित्यकार व सम्पादक पं0 छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ ने किया है। यह चिन्तनशील पाठकों के लिये बेहद खास है।








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