रह गए अवशेष अब किस्से कहानी
काशी में तीर्व्रता से मशहूर होने वाले साहित्यकारों में कवि व लेखक सुनील सेठ जी गिने जाने लगे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार स्मृतिशेष योगेंद्र नारायण चतुर्वेदी जी को अपना गुरु मानने एवं वाराणसी की ‘उद्गार’ संस्था को अपनी साहित्यिक पाठशाला कहने वाले श्री सुनील कुमार सेठ कविता के सुंदर स्वरूप को दुनिया के सामने इस किताब के माध्यम से पेश किए हैं। श्लेष, प्रसाद, समता, माधुर्य, सुकुमारता, अर्थव्यक्ति, उदारता, ओज, कान्ति और समाधि जो कविता के प्रमुख गुण हैं सभी इस संग्रह में शामिल इनकी कविताओं में कमोवेश दिखाई दे जाते हैं।
इनकी काव्य रचना को पढ़कर चित्त में श्रृंगार, मन में करुणा व हृदय में शांति के गहन भाव पैदा हो जाते हैं। हिन्दी कविता संग्रह ‘रह गए अवशेष अब किस्से कहानी’ पुस्तक का प्रकाशन देशभर में प्रतीष्ठित संस्थान ‘स्याही प्रकाशन’ से हुआ है एवं इसका संपादन वरिष्ठ साहित्यकार व संपादक श्री छतिश द्विवेदी ‘कुंठित’ ने किया है। कविता अपने सारे गुणों के साथ सुनील कुमार सेठ के हाथ को थाम ली है और इस संग्रह में अपने आप ऐसे अवतरित हुई है जैसे उनके गुरु स्मृतिशेष योगेंद्र नारायण चतुर्वेदी के गीतों में दुल्हन स्वरूप में जीवित उतर जाती थी। हालांकि सुनील कुमार सेठ अपने गुरु से दो कदम आगे बढ़ते हुए जीवन के और पहलुओं में प्रेम एवं करुणा के बहाव को समेकित कर एक मजे हुये तपस्वी कवि की तरह प्रस्तुत कर दिया है।
संग्रह ‘रह गए अवशेष अब किस्से कहानी’ में गांव और देश-दुनिया की छूटी हुई और सबसे बिछुड़ी हुई संस्कृति व सभ्यता की धुंधलाती हुई यादों से पूरित मीठी व सोंधी खुश्बू कविता में उतर आई है।








Reviews
There are no reviews yet.