maraye ki hardi

‘मड़ये की हरदी’ : पुस्तक समीक्षा | स्याही प्रकाशन

स्याही प्रकाशनसमालोचना टीम।

किसी भी समाज को उसकी लोक परंपराएँ, जीवन-मूल्य और संस्कृति ही जीवंत बनाए रखती हैं। सामाजिक चेतना को जाग्रत करने और उसे एक सुदृढ़ आधार देने में लोक परंपराओं की भूमिका सदैव से सर्वोपरि रही है। किसी लोक परंपरा का वास्तविक खांटीपन उसकी अपनी लोकभाषा, बोली और देशज शब्दावली में निहित होता है, जो उसे सहज और समृद्ध बनाती है। ऐसा ही एक अनुपम समाज भोजपुरी समाज है, जिसकी अपनी समृद्ध भाषाई विरासत है, अपने ठेठ देशज शब्द हैं और गुड़ की डली जैसी मिठास भरी लोकबोली भोजपुरी है। यह भाषा किसी बनावटी आवरण की मोहताज नहीं रही, बल्कि अपनी स्वाभाविक सरलता और अपनत्व के कारण सदियों से जनमानस के कंठहार के रूप में प्रवाहित होती रही है।

वैश्वीकरण और आधुनिकता की अंधी दौड़ के इस दौर में, अपनी माटी और बोली के प्रति बढ़ती संकीर्णता तथा उदासीनता के कारण विश्व भर में अनेक स्थानीय भाषाएँ और समृद्ध बोलियाँ असमय ही काल के गाल में समा गईं। न जाने कितनी क्षेत्रीय बोलियों ने लिखित रूप के अभाव में दम तोड़ दिया। यह आवश्यक नहीं होता कि कोई भाषा केवल लिखित रूप में ही दीर्घायु हो; अनगिनत देशज शब्द और वाचिक परंपराएँ अलिखित रहकर भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी तब तक जीवित रहती हैं, जब तक समाज उन्हें अपने अंतःकरण से अगली पीढ़ी को सौंपता रहता है। परंतु उपेक्षा के कारण जब स्थानीय बोलियों का लोप होता है, तो साहित्य का वृहद संसार निरंतर संकुचित होता चला जाता है। क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का संरक्षण वस्तुतः उनके सजग संवाहकों पर निर्भर करता है, जो उन्हें किसी किसान की भाँति निष्ठा से सींचते हैं। यही भाषाएँ आगे चलकर किसी सभ्यता और संस्कृति के गौरवशाली इतिहास की साक्ष्य बनती हैं, जिससे एक समरस, संवेदनशील और जीवंत समाज का निर्माण संभव होता है।

हमारा देश भारत विविध सामाजिक संस्कृतियों, बहुभाषा-भाषी और विविध वेशभूषा वाले जनसमूह का ऐसा अनूठा संगम है, जहाँ ‘कोस-कोस पर पानी बदले और चार कोस पर बानी’ की कहावत चरितार्थ होती है। क्षेत्रीयता के धरातल पर भोजपुरी एक ऐसी सशक्त भाषा बनकर उभरी है, जिसने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। इसका मूल कारण यह है कि भोजपुरी ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वाभाविक और लोकधर्मी स्वरूप को कभी नहीं त्यागा। यह भाषा पीढ़ियों से सुनकर, गाकर और जीवन के विविध अनुष्ठानों में रच-बसकर आज राजभाषा के मुहाने तक आ पहुँची है। भोजपुरी ने भिखारी ठाकुर के रूप में अपना शेक्सपियर पाया और अनेक कालजयी रचनाधर्मियों ने अपनी कठोर साधना से इसके साहित्य को परवान चढ़ाया। इन रचनाकारों ने क्षेत्रीय लोक संस्कृति, सामाजिक चेतना और देशज शब्दों को अपनी लेखनी का संबल बनाकर इसे प्रतिष्ठा दिलाई, जिसके फलस्वरूप आज लोकतांत्रिक व्यवस्था और साहित्य संसार में भोजपुरी भाषी समाज एक अहम स्थान रखता है।

इसी गौरवशाली साहित्यिक व सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध करने में उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक विंध्य क्षेत्र (मिर्ज़ापुर) की माटी में जन्मे संवेदनशील रचनाकार और अभियंता कवि राम नरेश ‘नरेश’ जी निरंतर साधनारत हैं। कवि ‘नरेश’ जी भोजपुरी परंपरा के विशुद्ध रंग में रंगी, माटी की सौंधी सुगंध से ओत-प्रोत और नए आवरण में सजी-धजी दुलहिन के रूप-शृंगार जैसी गीतों की अनुपम श्रृंखला को अपने सद्यःप्रकाशित काव्य संग्रह ‘मड़ये की हरदी’ के माध्यम से पाठकों के समक्ष लेकर उपस्थित हुए हैं। यह संग्रह केवल गीतों का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि लोक विधा के विभिन्न सोपानों का प्रामाणिक प्रतिनिधित्व करता है। रचनाकार ने पूर्वांचल के ग्रामीण अंचल में रचे-बसे संस्कार गीतों, विरह की मार्मिक व्यथा, अनुष्ठानिक पूजा-गीतों और राष्ट्रभक्ति के ज्वार को न केवल अपनी सहज बोली में पिरोया है, बल्कि उन्हें एक नया स्वर देकर समकालीन संदर्भों में प्रासंगिक भी बना दिया है। ‘नरेश’ जी ने लोक परंपरा की उस हर सूक्ष्म नाड़ी पर अपनी उंगली रखी है, जहाँ से लोक जीवन के वास्तविक राग प्रस्फुटित होते हैं, ताकि यह अनमोल सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

‘मड़ये की हरदी’ काव्य संग्रह में कवि की लेखनी ने क्षेत्रीय पर्व-त्योहारों, लोकव्यवहार, आचरण, सामाजिक सरोकारों, खेतिहर मजदूरों के जीवन-संघर्ष, विरहनियों की टीस तथा ऋतु-चक्र के विविध रंगों—जाड़ा, गर्मी और बरसात—को बहुत गहराई से स्पर्श किया है। और ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि राम नरेश ‘नरेश’ जी मिर्ज़ापुर के उस संवेदनशील परिवेश की उपज हैं, जहाँ की हवाओं में विश्वप्रसिद्ध कजरी की मिठास रची-बसी है। पूर्वांचल में कजरी के बिना नवविवाहिता का पहला सावन अधूरा माना जाता है। यह कजरी मिर्ज़ापुर और चुनार की सुरम्य पहाड़ियों तथा वहाँ के किसानी परिवेश से उपजती है। जब वर्षा ऋतु में काले मेघ घिर आते हैं, पहाड़ियों पर हरियाली की चादर बिछ जाती है और ऐसे मादक वातावरण में परदेस गया प्रियतम लौटकर नहीं आता, तब वह वियोग कजरी बनकर गूँजने लगता है। कवि ‘नरेश’ का संवेदनशील मन इस विरह-वेदना को स्वयं से जोड़ लेता है और जब एक अभियंता का बौद्धिक मन सहृदयता के धरातल पर उतरता है, तो वह राधा-गोपी के निश्छल प्रेम-भाव में लीन हो जाता है। अमावस की घनी रात में भी जब वह अपने अंतर्मन में चंद्रावती की छवि तलाशता है, तब उसके भीतर झूमर और कजरी के हिंडोले डोलने लगते हैं, जो आँचलिकता की पराकाष्ठा है।

भोजपुरी साहित्य का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इसमें मनुष्य के जन्म से लेकर महाप्रयाण तक के हर संस्कार के लिए विशिष्ट शैलियों के गीत विद्यमान हैं। शिशु के जन्म पर गाए जाने वाले मांगलिक सोहर से लेकर विवाह के विविध चरणों—मटकोड़, हरदी, मड़वा, सिंदूरदान, परिहास से भरे गाली गीत और बिटिया की विदाई के करुण क्रंदन तक—सब कुछ लोक चेतना का अभिन्न हिस्सा है। इसके साथ ही व्रत-त्योहार, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, चैत्र मास का चैता तथा जातीय और लोक-नृत्यों पर आधारित गीत जैसे अहिरउ, धोबियउ और गोड़ऊ की ताल सनातन संस्कृति के संवाहक हैं। वीरता के रस में पगे आल्हा, बिरहा और वीर लोरिक के आख्यान इसी वाचिक और लिखित परंपरा के आधार हैं। जब तक भारत गाँवों का देश है और इसकी मिट्टी की ‘सोन चिरैया’ सुरक्षित है, तब तक यह संस्कृति अक्षुण्ण रहेगी। खेतिहर मजदूर का परदेस जाकर पसीना बहाना, संवादहीनता, प्रियतम के न लौटने की चिंता और विदेशिया विधा के जनक भिखारी ठाकुर की परंपरा को ‘नरेश’ जी ने इस संग्रह में नए कलेवर और नए भाव-बोध के साथ पुनः जीवंत किया है।

शिल्प और भाषा की दृष्टि से इंजीनियर कवि राम नरेश ‘नरेश’ जी ने ‘मड़ये की हरदी’ में बनावटी भाषा के स्थान पर विशुद्ध भोजपुरी और ठेठ देशज शब्दों का प्रयोग किया है। यद्यपि देशज शब्दों की कोई औपचारिक व्याकरणिक व्युत्पत्ति नहीं होती, तथापि वे अपने समाज और परिवेश में इतने गहरे धंसे होते हैं कि वे सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं। कवि ने सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों पर प्रहार करने के लिए लोकोक्तियों तथा मुहावरों का अत्यंत सटीक और मारक प्रयोग किया है। संग्रह की सभी रचनाएँ गेय शैली में हैं, जो लोक संस्कृति की मूल आत्मा मानी जाती है।

समग्र रूप से विचार करें तो ‘मड़ये की हरदी’ का पाठन अथवा श्रवण केवल मनोरंजन की सीमा में नहीं बँधता, बल्कि यह लोक परंपरा और ग्रामीण भारत की उत्सवधर्मिता का एक प्रामाणिक व जीवंत दस्तावेज है। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच अपनी जड़ों, माटी की सुगंध और संस्कारों को बचाए रखने का यह प्रयास अत्यंत स्तुत्य है। इस संग्रह के माध्यम से राम नरेश ‘नरेश’ जी वर्तमान कालखंड में भोजपुरी लोक परंपरा के एक सजग, सशक्त और प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में अपनी अमिट पहचान स्थापित करते हैं।